भारत सरकार के ‘अमृत काल’ इंफ्रास्ट्रक्चर विजन के तहत देश के पोर्ट्स, समुद्री तटों और मैरीटाइम इंफ्रास्ट्रक्चर को बड़े स्तर पर विकसित करने की तैयारी चल रही है। इस बदलाव का फायदा कई कंपनियों को मिल सकता है, लेकिन स्मॉल-कैप कंपनी नॉलेज मरीन एंड इंजीनियरिंग वर्क्स यानी KMEW भी इस सेक्टर में तेजी से अपनी जगह बना रही है। कंपनी का कारोबार केवल मरीन इंजीनियरिंग और सर्विसेज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जहाजों के निर्माण, संचालन और रखरखाव से जुड़े पूरे ईकोसिस्टम पर काम कर रही है।
KMEW की ग्रोथ की सबसे बड़ी वजहों में उसका अपना शिपयार्ड और इन-हाउस क्षमता शामिल है। कंपनी ने महाराष्ट्र में प्रस्तावित वधावन पोर्ट के नजदीक सफाले में शिपयार्ड विकसित करने के लिए जमीन अधिग्रहित की है। इससे कंपनी को भविष्य में खुद जहाज और दूसरे समुद्री वेसल्स बनाने की क्षमता मिलेगी। कंपनी इन जहाजों का संचालन और स्वामित्व भी अपने पास रखकर केवल निर्माण से नहीं, बल्कि लंबे समय तक ऑपरेशनल कमाई हासिल करने की दिशा में बढ़ रही है।
कंपनी के पास मजबूत ऑर्डर बुक भी इसकी ग्रोथ स्टोरी को सपोर्ट कर रहा है। वित्त वर्ष 2026 में KMEW ने करीब 1,075 करोड़ रुपये के नए ऑर्डर हासिल किए। इसके बाद कंपनी का अन-एग्जीक्यूटेड ऑर्डर बुक लगभग 1,400 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसमें ‘ग्रीन टग ट्रांजिशन प्रोग्राम’ के तहत मिले करीब 650 करोड़ रुपये के दो बड़े कॉन्ट्रैक्ट भी शामिल हैं। इन प्रोजेक्ट्स की खासियत यह है कि इनके जरिए कंपनी को लंबे समय तक निर्धारित राजस्व मिलने की उम्मीद है।
KMEW की एक और खासियत उसका अत्याधुनिक ड्रेजिंग उपकरण है। कंपनी के पास ‘River Pearl 47’ नाम का बैकहो ड्रेजर है, जिसकी मदद से समुद्र के अंदर काफी गहराई तक चट्टानों की ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग की जा सकती है। इस क्षमता का इस्तेमाल बंदरगाहों के विकास और समुद्री मार्गों को बेहतर बनाने वाले प्रोजेक्ट्स में किया जा सकता है। कंपनी ने जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी यानी JNPA में इस तकनीक की क्षमता का प्रदर्शन भी किया है।
भारत में नए पोर्ट्स के निर्माण, मौजूदा बंदरगाहों के विस्तार और समुद्री व्यापार को बढ़ावा देने पर जोर बढ़ रहा है। ऐसे में ड्रेजिंग, टग ऑपरेशन, वेसल मैनेजमेंट और पोर्ट से जुड़ी इंजीनियरिंग सेवाओं की मांग बढ़ सकती है। न्यू मंगलोर, विशाखापट्टनम, मुंबई और तूतीकोरिन जैसे प्रमुख बंदरगाहों पर इंफ्रास्ट्रक्चर गतिविधियां बढ़ने से KMEW जैसी विशेषज्ञ कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
कंपनी की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि वह केवल ठेके हासिल करने वाली कंपनी बने रहने के बजाय अपने समुद्री परिसंपत्ति आधार को मजबूत कर रही है। अगर कंपनी जहाजों के निर्माण और संचालन के साथ लंबे समय तक कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने में सफल रहती है, तो इससे उसके कारोबार में अधिक स्थिरता आ सकती है।
हालांकि, निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि स्मॉल-कैप कंपनियों में कारोबार और शेयर की कीमत में उतार-चढ़ाव अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है। मजबूत ऑर्डर बुक हमेशा भविष्य के मुनाफे की गारंटी नहीं देती। शिपयार्ड निर्माण, पूंजीगत खर्च, प्रोजेक्ट पूरा होने की समयसीमा और सरकारी या पोर्ट प्रोजेक्ट्स पर निर्भरता जैसे जोखिम भी मौजूद रहते हैं।
कुल मिलाकर, भारत के बढ़ते मैरीटाइम इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के बीच KMEW ने खुद को एक ऐसी कंपनी के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है, जो ड्रेजिंग से लेकर शिपबिल्डिंग, वेसल ऑपरेशन और मेंटेनेंस तक कई क्षेत्रों में मौजूद हो। मजबूत ऑर्डर बुक, अपना शिपयार्ड और समुद्री परिसंपत्तियों पर बढ़ता फोकस कंपनी की ग्रोथ कहानी को मजबूत कर सकते हैं। हालांकि, निवेश से पहले कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, वैल्यूएशन और जोखिमों का स्वतंत्र रूप से आकलन करना जरूरी है।