भारत के माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में पिछले एक साल के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सेक्टर का कुल पोर्टफोलियो घटा है, कर्ज लेने वालों की संख्या कम हुई है और एक्टिव लोन भी घटे हैं। हालांकि, इसी अवधि में मौजूदा ग्राहकों को दिए जाने वाले लोन का औसत साइज बढ़ गया है। यानी माइक्रोफाइनेंस कंपनियां अब पहले की तुलना में कम ग्राहकों को ज्यादा रकम का कर्ज दे रही हैं।
CRIF हाईमार्क की जून 2026 माइक्रो लेंडिंग रिपोर्ट के मुताबिक, देश का कुल माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो एक साल में 3.59 लाख करोड़ रुपये से घटकर 3.33 लाख करोड़ रुपये रह गया है। इस तरह पोर्टफोलियो में करीब 7.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। यह कमी बताती है कि माइक्रोफाइनेंस कंपनियां अब कर्ज वितरण को लेकर पहले की तुलना में अधिक सतर्क रुख अपना रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, माइक्रोफाइनेंस से कर्ज लेने वाले लोगों की संख्या भी 8 करोड़ से घटकर 6.6 करोड़ रह गई है। यानी करीब 17 फीसदी की कमी आई है। इसी तरह एक्टिव लोन की संख्या 13.2 करोड़ से घटकर 10.3 करोड़ रह गई। इन आंकड़ों से साफ है कि सेक्टर में उधार लेने वाले ग्राहकों और कुल सक्रिय कर्ज, दोनों में उल्लेखनीय गिरावट आई है।
हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। गिरते पोर्टफोलियो और ग्राहकों की संख्या के बावजूद एक एक्टिव लोन पर औसत एक्सपोजर करीब 19 फीसदी बढ़कर लगभग 32,400 रुपये हो गया है। इसका अर्थ है कि कंपनियां अब अपेक्षाकृत कम संख्या में ग्राहकों को पहले से अधिक राशि का कर्ज दे रही हैं। यह बदलाव माइक्रोफाइनेंस सेक्टर की बदलती रणनीति की ओर संकेत करता है।
पिछले कुछ वर्षों में माइक्रोफाइनेंस उद्योग को ओवर-बॉरोइंग, बढ़ते डिफॉल्ट और कर्ज की गुणवत्ता से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। कई ग्राहकों के पास एक से ज्यादा संस्थानों के कर्ज होने के कारण उनकी रीपेमेंट क्षमता पर दबाव बढ़ा। ऐसे माहौल में कंपनियों के लिए केवल लोन की संख्या बढ़ाना प्राथमिकता नहीं रह गया है। अब फोकस कर्ज की गुणवत्ता, ग्राहक की भुगतान क्षमता और जोखिम प्रबंधन पर अधिक दिखाई दे रहा है।
औसत लोन साइज में बढ़ोतरी का एक कारण यह भी हो सकता है कि कंपनियां छोटे-छोटे कई कर्ज देने के बजाय मौजूदा और बेहतर क्रेडिट प्रोफाइल वाले ग्राहकों पर अधिक ध्यान दे रही हैं। इससे ऑपरेशनल लागत और क्रेडिट रिस्क को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर, माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में मौजूदा बदलाव को केवल गिरावट के तौर पर देखना सही नहीं होगा। ग्राहकों और एक्टिव लोन की संख्या में कमी एक चुनौती है, लेकिन औसत लोन एक्सपोजर का बढ़ना यह संकेत देता है कि उद्योग अब मात्रा के बजाय गुणवत्ता और टिकाऊ ग्रोथ पर जोर दे रहा है। आने वाले समय में सेक्टर की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां बढ़ते औसत लोन साइज के साथ डिफॉल्ट और ओवर-बॉरोइंग के जोखिम को किस तरह नियंत्रित करती हैं।