देश की सबसे बड़ी प्याज मंडी लासलगांव में बीते कुछ दिनों के भीतर थोक भाव में 25 प्रतिशत तक की तीव्र तेजी दर्ज की गई है। इस मूल्य वृद्धि का मुख्य कारण महाराष्ट्र में मानसून के विलंब से पहुंचने और दक्षिणी राज्यों में खरीफ बुवाई पिछड़ने से नई फसल की आवक में देरी होना माना जा रहा है। वर्तमान में बाजार की मांग को पूरा करने के लिए मार्च-अप्रैल में भंडारित की गई रबी फसल के प्याज पर ही निर्भरता बनी हुई है। हालांकि, प्रतिकूल मौसम के चलते इस बार भंडारित प्याज की गुणवत्ता प्रभावित हुई है।
प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, मंडी में औसत थोक मूल्य 21.50 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 27 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंच गया है। वहीं, प्रीमियम श्रेणी के प्याज की दरें 30 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुकी हैं। आमतौर पर अक्टूबर महीने तक देश में आपूर्ति का मुख्य सहारा रबी स्टॉक ही रहता है, जिसे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना से आने वाली शुरुआती खरीफ उपज का सहारा मिलता है। लेकिन दक्षिण भारत में बुवाई देर से होने के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है।
बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने और घरेलू बाजार में उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार सितंबर के पहले सप्ताह से अपने बफर स्टॉक से प्याज की बिक्री शुरू करने की योजना बना रही है। हालांकि, इस वर्ष सरकार को अपने 2,00,000 टन के निर्धारित खरीद लक्ष्य को पूरा करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, जबकि खरीद दरों में बार-बार बढ़ोतरी की गई थी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी हफ्तों में प्याज की कीमतों का रुख मुख्य रूप से सितंबर महीने के मौसम पर निर्भर करेगा। यदि दक्षिणी भारत में बारिश से फसल को नुकसान नहीं पहुंचता है, तो कीमतें नियंत्रण में रह सकती हैं।