तेलंगाना की राजनीति इस समय एक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे को लेकर गरमाई हुई है। मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी की सरकार ने पिछड़े वर्गों (OBC) को स्थानीय निकाय चुनावों में 42% आरक्षण देने का विधेयक विधानसभा में पास किया है। यह विधेयक राज्य की सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है, लेकिन इसके क्रियान्वयन को लेकर केंद्र और राज्य के बीच दायित्वों और अधिकारों की राजनीति शुरू हो गई है।
विधेयक को कानूनी वैधता दिलाने के लिए मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने के लिए समय मांगा है ताकि वह इस विधेयक की मंजूरी का अनुरोध कर सकें। लेकिन इसी बीच बीआरएस एमएलसी के. कविता की प्रतिक्रिया सामने आई है, जो इस मुद्दे को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों पर तीखा हमला कर रही हैं।
🔎 क्या है विधेयक का उद्देश्य?
मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की सरकार द्वारा लाए गए इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य यह है कि राज्य के पिछड़े वर्गों को स्थानीय निकाय चुनावों — यानी ग्राम पंचायत, मंडल परिषद, जिला परिषद, नगरपालिका व नगर निगमों — में 42% तक आरक्षण मिले। यह कदम समाज के हाशिये पर खड़े वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है।
हालांकि, यह विधेयक संविधान की 50% आरक्षण की सीमा को पार करता है, जिसके चलते इसे राष्ट्रपति की मंजूरी अनिवार्य है। इसी कानूनी पेच ने इस पर राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है।
🗣️ के कविता का बयान: "दोनों सरकारें OBC के साथ लुका-छिपी खेल रही हैं"
बीआरएस नेता के. कविता, जो पूर्व सांसद भी रह चुकी हैं और राज्य की राजनीति में एक प्रभावशाली चेहरा हैं, ने इस विधेयक पर अपनी नाराज़गी जाहिर की है। उन्होंने कहा:
“तेलंगाना की कांग्रेस सरकार और केंद्र की भाजपा सरकार दोनों ही ओबीसी समुदाय के साथ लुका-छिपी खेल रही हैं। कांग्रेस ने चुनावों से पहले ओबीसी से 42% आरक्षण का वादा किया था, लेकिन अब जब इसे लागू करने की बारी आई तो वह इसे केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बता रही है।”
कविता ने भाजपा को भी आड़े हाथों लिया और कहा कि भाजपा की तरफ से इस विषय पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इस मुद्दे पर केंद्र सरकार की चुप्पी क्यों है?
⏳ विधेयक की मौजूदा स्थिति
तेलंगाना विधानसभा और विधान परिषद दोनों ने इस विधेयक को पास कर दिया है। इसके बाद राज्य सरकार ने एक अध्यादेश (ordinance) भी पारित किया, लेकिन वह राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए लंबित है। संविधान के अनुसार जब कोई राज्य सरकार 50% से अधिक आरक्षण देने का निर्णय लेती है, तो उसे केंद्र सरकार के माध्यम से राष्ट्रपति की अनुमति लेनी होती है।
इस प्रक्रिया की धीमी गति और राजनीतिक असमंजस ने इस मुद्दे को टकराव की स्थिति में ला दिया है।
⏱️ भूख हड़ताल का ऐलान
के कविता ने इस मुद्दे को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए 4, 5 और 6 अगस्त को हैदराबाद में 72 घंटे की भूख हड़ताल करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि यह हड़ताल सिर्फ कांग्रेस या भाजपा के खिलाफ नहीं, बल्कि ओबीसी वर्ग के न्याय और अधिकारों के समर्थन में है।
उन्होंने कहा:
“हमारी भूख हड़ताल का उद्देश्य दोनों सरकारों पर दबाव बनाना है ताकि वे इस मुद्दे पर फैसला लें। ओबीसी वर्ग अब और इंतज़ार नहीं कर सकता।”
कविता को उम्मीद है कि इस हड़ताल से या तो राष्ट्रपति मंजूरी प्रदान करेंगी या फिर केंद्र और राज्य मिलकर इस पर ठोस कदम उठाएंगे।
⚖️ आरक्षण पर संवैधानिक बहस
यह मामला केवल तेलंगाना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक बहस को भी जन्म दे रहा है — क्या किसी राज्य को 50% से अधिक आरक्षण देने की अनुमति दी जानी चाहिए? सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार (1992) मामले में 50% की सीमा तय की थी, लेकिन तमिलनाडु जैसे राज्यों में इससे अधिक आरक्षण लागू है, जिसे संविधान की नौंवी अनुसूची में शामिल कर विशेष सुरक्षा दी गई है।
तेलंगाना सरकार भी अब इसी राह पर चलने की संकेत दे रही है।
📌 निष्कर्ष
तेलंगाना में पिछड़े वर्गों को 42% आरक्षण देने का मुद्दा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम है। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की पहल, के कविता की भूख हड़ताल और केंद्र की चुप्पी — तीनों मिलकर इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस में बदल सकते हैं।
अब सबकी निगाहें राष्ट्रपति भवन पर हैं — क्या मंजूरी मिलेगी या यह मुद्दा भी अन्य सामाजिक योजनाओं की तरह कागज़ों और वादों में सिमट जाएगा? आने वाले दिन इस पर निर्णायक साबित हो सकते हैं।