रूपहले पर्दे पर आई सुपरहिट फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ की भावुक कर देने वाली कहानी मध्य प्रदेश के सागर जिले में हकीकत बनकर सामने आई है। साल 2019-20 के दौरान मात्र 12 साल की उम्र में ट्रेन में भटकते हुए नीमच रेलवे स्टेशन पहुंचे एक बेसहारा, मूक-बधिर बच्चे को आखिरकार सात साल बाद उसका असली परिवार मिल गया है।
बाल कल्याण समिति की सिफारिश पर पिछले तीन साल से सागर के 'घरौंदा आश्रम' में रह रहे इस बच्चे की घर वापसी के पीछे आश्रम की जांबाज संचालिका डॉ. प्रीति यादव का अटूट हौसला और एक नायाब डिजिटल विचार (आइडिया) रहा है। उन्होंने 'मिशन कबीर' चलाकर इस नामुमकिन सी दिखने वाली पहेली को सुलझा दिया और अब यह मूक-बधिर किशोर अपने माता-पिता के पास गुजरात लौटने के लिए पूरी तरह तैयार है।
रेलवे स्टेशन पर जब यह बच्चा मिला था, तब वह न तो अपनी बात बोल पाता था और न ही सुन सकता था। उसकी जेब में न तो कोई पहचान पत्र था और न ही देश के किसी भी पुलिस थाने में उसकी गुमशुदगी की शिकायत दर्ज थी। आश्रम में उसे ‘वीरेंद्र उर्फ राम’ नाम दिया गया था। पुलिस रिकॉर्ड, फिंगरप्रिंट मिलान और सोशल मीडिया पर तस्वीरें पोस्ट करने के सारे पारंपरिक तरीके जब पूरी तरह नाकाम हो गए, तब डॉ. प्रीति यादव ने एक जादुई तरकीब अपनाई।
उन्होंने बच्चे को लैपटॉप के सामने बिठाया और देश के अलग-अलग राज्यों के प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थलों, रेलवे स्टेशनों, मंदिरों, त्योहारों और भौगोलिक दृश्यों की तस्वीरें दिखानी शुरू कीं। लगातार तस्वीरें बदलने के दौरान जैसे ही गुजरात के एक विख्यात स्थानीय मंदिर और विशिष्ट रेलवे स्टेशन की फोटो स्क्रीन पर आई, बच्चे की आंखों में चमक आ गई और उसने इशारों में पहचान की मोहर लगा दी। इस सुराग के आधार पर जब गुजरात पुलिस और स्थानीय एनजीओ से संपर्क किया गया, तो कबीर के असली माता-पिता का पता चल गया, जो पिछले सात सालों से अपने लाडले की राह देख रहे थे।