बनारस न्यूज डेस्क: पहली बात, छोटी साइबर ठगी के मामले लोगों के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं क्योंकि पीड़ितों की रकम वापस नहीं मिल पा रही है। लोकल थाना और साइबर थाना दोनों एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहते हैं, और पीड़ित चक्कर लगाने को मजबूर हैं। सिर्फ 11 महीनों में ही 41 करोड़ रुपये की साइबर ठगी सामने आई, लेकिन इसमें से महज 12 प्रतिशत रकम होल्ड हो सकी और रिफंड तो सिर्फ 4.88 प्रतिशत यानी करीब 2.15 करोड़ रुपये ही हुआ।
अब जिन लोगों ने साइबर ठगी की शिकायत दर्ज कराई है, उन्हें यह भी नहीं पता कि केस की स्थिति क्या है या पैसा वापस मिलने की कोई उम्मीद है भी या नहीं। थानों की हालत यह है कि अगर कोई शिकायत लेकर पहुंचे तो उन्हें सीधे साइबर कैफे भेज दिया जाता है। सबसे ज़्यादा फ्रॉड क्रेडिट कार्ड अपडेट, बैंक केवाईसी और आकर्षक ऑनलाइन ऑफर के नाम पर किए जा रहे हैं। छह महीने के आंकड़े देखें तो पांच लाख से ज्यादा वाली 86 शिकायतों में सिर्फ 22 प्रतिशत मामलों में ही प्राथमिकी दर्ज हो सकी, बाकी सब जांच के नाम पर रुकी पड़ी हैं।
केसों की बात करें तो सिगरा के विकास से क्रेडिट कार्ड बीमा एक्टिव होने के नाम पर ओटीपी लेकर 34 हजार ले लिए गए और सुनवाई कहीं नहीं हुई। भेलूपुर के अमलेंदु दूबे से मई में एक लाख का फ्रॉड हुआ, लेकिन साइबर थाने ने एफआईआर दर्ज नहीं की तो उन्हें चंदौली जाकर मामला दर्ज कराना पड़ा। वहीं पहड़िया के विक्की सिंह से बिजली बिल के नाम पर 41 हजार की ठगी हुई और थानों के चक्कर खाते-खाते उन्होंने एफआईआर ही न कराने का फैसला कर लिया।
अधिकारियों का कहना है कि साइबर फ्रॉड के मामलों को गंभीरता से लेने का निर्देश दिया गया है और अगर एफआईआर दर्ज न करने की शिकायत मिलती है तो कार्रवाई होगी। बड़े मामलों में कमिश्नरेट पुलिस रकम होल्ड कराने और कानूनी प्रक्रिया से रिकवरी की कोशिश कर रही है। साथ ही लोगों को जागरूक भी किया जा रहा है।