बनारस न्यूज डेस्क: काशी के मणिकर्णिका घाट पर हर साल आयोजित होने वाली अनोखी “मसाने की होली” इस बार विवादों में घिर गई है। आयोजन से पहले ही काशी विद्वत परिषद और कार्यक्रम आयोजक आमने-सामने आ गए हैं। परिषद इसे शास्त्र विरोधी बता रही है, जबकि आयोजक इसे प्राचीन धार्मिक परंपरा और भगवान शिव से जुड़ा आयोजन मान रहे हैं।
आयोजक गुलशन कपूर का कहना है कि कुछ लोग काशी विद्वत परिषद का नाम लेकर इस आयोजन को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसे लोग काशी के स्थानीय नहीं हैं और केवल चार-पांच लोग बाहर के शहरों से आए हैं। गुलशन के अनुसार, मसाने की होली की परंपरा सदियों पुरानी है और पहले इसमें लोगों की संख्या सीमित थी, लेकिन सोशल मीडिया के कारण अब यह विश्व प्रसिद्ध बन चुकी है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, रंगभरी एकादशी को बाबा विश्वनाथ भक्तों के साथ होली खेलते हैं, और इसके अगले दिन फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को महाश्मशान में चिता भस्म की होली खेली जाती है। आयोजक दावा करते हैं कि इस होली में भगवान शिव अदृश्य रूप में शामिल होते हैं और किसी से कोई चंदा नहीं लिया जाता।
वहीं, काशी विद्वत परिषद से जुड़े पंडित विनय पांडेय का कहना है कि महाश्मशान में यह आयोजन शास्त्र संवत नहीं है। उनका मानना है कि श्मशान का अपना मर्यादित स्थान है और वहां ऐसे उत्सव आयोजित करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं और अन्य लोगों की भागीदारी काशी के शास्त्रीय नियमों के खिलाफ है। इस विवाद ने काशी में परंपरा और शास्त्र के बीच बहस को एक बार फिर जोर दे दिया है।