शेयर बाजार में गिरावट आते ही बहुत से निवेशक घबरा जाते हैं। उन्हें लगता है कि बाजार अभी और नीचे जाएगा, इसलिए वे अपने निवेश को बेचकर कैश में चले जाते हैं। इसके बाद उनकी कोशिश होती है कि जब बाजार पूरी तरह निचले स्तर पर पहुंच जाए, तब दोबारा निवेश किया जाए। निवेश की इस रणनीति को आम तौर पर Market Timing कहा जाता है।
लेकिन समस्या यह है कि बाजार का सही निचला स्तर पहले से पहचानना बेहद मुश्किल होता है। अब एबाकस म्यूचुअल फंड की एक रिपोर्ट ने लंबे समय के आंकड़ों के जरिए बताया है कि बाजार से बाहर रहने का फैसला निवेशकों के रिटर्न पर कितना बड़ा असर डाल सकता है।
यह रिपोर्ट अप्रैल 2005 से जुलाई 2026 तक यानी करीब 21 साल के आंकड़ों पर आधारित है। इसमें Nifty 50 TRI के प्रदर्शन को आधार बनाकर यह देखा गया कि अगर कोई निवेशक इस लंबे सफर के दौरान बाजार के सबसे अच्छे प्रदर्शन वाले कुछ दिनों से बाहर रहता है, तो उसके कुल रिटर्न पर क्या असर पड़ता है।
Nifty 50 में सिर्फ 5 अच्छे दिन छूटे तो बड़ा नुकसान
रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि बाजार में तेजी के कुछ चुनिंदा दिन लंबे समय के रिटर्न में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। अगर निवेशक इन दिनों बाजार से बाहर रहता है, तो उसके निवेश का CAGR यानी सालाना औसत चक्रवृद्धि रिटर्न काफी कम हो सकता है।
यानी निवेशक बाजार गिरने पर डरकर बाहर निकलता है और फिर सही समय का इंतजार करता रहता है, तो वह केवल गिरावट से बचने की कोशिश नहीं कर रहा होता, बल्कि अचानक आने वाली तेज रिकवरी से भी चूक सकता है।
शेयर बाजार का इतिहास बताता है कि बड़ी गिरावट के बाद कई बार तेज उछाल वाले दिन आते हैं। समस्या यह है कि इन दिनों की भविष्यवाणी पहले से करना बेहद कठिन होता है। कई बार बाजार में सबसे मजबूत तेजी उसी समय आती है, जब निवेशक सबसे ज्यादा निराश और सतर्क होते हैं।
Market Timing क्यों मुश्किल है?
मान लीजिए किसी निवेशक ने बाजार में गिरावट देखकर अपने शेयर बेच दिए। अब उसे दो फैसले लेने होंगे। पहला, बाजार का निचला स्तर कब आएगा और दूसरा, बाजार में दोबारा निवेश करने का सही समय क्या होगा।
अगर बाजार उम्मीद के मुताबिक नीचे नहीं जाता और अचानक तेजी शुरू हो जाती है, तो निवेशक उस रिकवरी का फायदा नहीं उठा पाता। दूसरी ओर, अगर वह बहुत देर तक बाजार से बाहर रहता है, तो उसे बाद में ऊंचे स्तर पर दोबारा निवेश करना पड़ सकता है।
यही वजह है कि बाजार की दिशा को लगातार सही तरीके से पकड़ने की कोशिश आम निवेशकों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
लंबे समय तक निवेश करने का फायदा
21 साल के आंकड़ों से मिलने वाला बड़ा सबक यह है कि शेयर बाजार में निवेश के दौरान केवल गिरावट से बचना ही महत्वपूर्ण नहीं है। बाजार में बने रहना भी उतना ही जरूरी हो सकता है।
जो निवेशक लंबे समय तक निवेशित रहता है, उसे बाजार की अलग-अलग तेजी और गिरावट के दौर से गुजरना पड़ता है। इस दौरान बाजार के कुछ बेहद अच्छे दिन भी उसके पोर्टफोलियो का हिस्सा बनते हैं। यही अच्छे दिन लंबे समय में कंपाउंडिंग और कुल रिटर्न को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।
इसके विपरीत, बार-बार बाजार से बाहर निकलने और फिर वापस आने की कोशिश में निवेशक भावनात्मक फैसले ले सकता है। इससे निवेश का अनुशासन प्रभावित होने के साथ-साथ रिटर्न भी कम हो सकता है।
निवेशकों के लिए क्या सीख?
इस रिपोर्ट का मतलब यह नहीं है कि बाजार में हर परिस्थिति में बिना सोचे निवेश करते रहना चाहिए। बल्कि इसका संकेत यह है कि केवल बाजार की छोटी अवधि की चाल का अनुमान लगाकर बार-बार खरीद-बिक्री करना जोखिम भरा हो सकता है।
लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अपने लक्ष्य, जोखिम क्षमता और निवेश अवधि के आधार पर रणनीति बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण है। गिरावट के समय घबराकर पूरा निवेश निकाल लेने के बजाय निवेशक अपनी एसेट एलोकेशन और वित्तीय लक्ष्य के अनुसार फैसला कर सकते हैं।
Nifty 50 के 21 साल के आंकड़ों से यही संदेश मिलता है कि बाजार में बने रहने का समय अक्सर बाजार की टाइमिंग करने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। बाजार के कुछ बेहतरीन दिनों को मिस करना लंबे समय में निवेश के कुल रिटर्न पर बड़ा असर डाल सकता है।a