बनारस न्यूज डेस्क: वाराणसी की अनूठी परंपराओं में एक खास आयोजन हर साल एक अप्रैल को होता है—महामूर्ख मेला। इस मेले में बुद्धिजीवियों और कलाकारों की भागीदारी के साथ हास्य-व्यंग्य का अनोखा रंग देखने को मिलता है। इस बार भी गंगा तट पर धूमधाम से महामूर्ख मेले का आयोजन किया गया, जहां परंपरा के अनुसार पुरुष दुल्हन बने और महिलाएं दूल्हा। गधे की ध्वनि से मेले की शुरुआत हुई और अगड़म-बगड़म मंत्रोच्चार के साथ उल्टी शादी करवाई गई, जो तुरंत टूट भी गई।
इस आयोजन में काशी की सांस्कृतिक विरासत को भी खास महत्व दिया गया। स्थानीय कलाकारों ने लोक नृत्य ‘कालबेलिया’ प्रस्तुत किया, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं, उत्तर प्रदेश पुलिस और साइबर क्राइम विभाग के अधिकारियों ने मंच पर मौजूद लोगों को ऑनलाइन ठगी से बचने के टिप्स दिए, ताकि वे असली दुनिया में मूर्ख न बनें। हास्य कवियों ने अपने व्यंग्य बाणों से समाज के बुद्धिजीवियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि असल मूर्ख कौन है—जो खुद को बुद्धिमान समझता है या जो अपनी मूर्खता को स्वीकार करता है।
इस मौके पर देशभर के मशहूर कवियों और व्यंग्यकारों को विशेष थीम पर आधारित ‘हथकड़ी’ भेंट कर सम्मानित किया गया। साथ ही, दूल्हा बनी डॉ. नेहा द्विवेदी और दुल्हन बने डॉ. शिव शक्ति द्विवेदी ने परंपरा अनुसार शादी की और फिर हास्यपूर्ण अंदाज में उसे तोड़ दिया। महामूर्ख मेले की यह अनोखी परंपरा पिछले 56 वर्षों से चली आ रही है, जो हर बार नए जोश और हास्य के नए रंगों के साथ लोगों का मनोरंजन करती है।