ढाका: ग्लोबल सेंटर फॉर डेमोक्रेटिक गवर्नेंस (GCDG) द्वारा जारी 'बांग्लादेश में बिना मुकदमे के मौत' नामक एक हालिया रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सनसनी मचा दी है। इस विलेख रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2024 से जून 2026 के बीच की 22 महीनों की कूटनीतिक अवधि में बांग्लादेश के भीतर कानून-प्रवर्तन एजेंसियों की कस्टडी (हिरासत) में होने वाली मौतों की संख्या कड़ाई से बढ़कर 101 तक पहुंच गई है। रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि यह चिंताजनक वृद्धि पूर्व मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के 18 महीनों के शासनकाल से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) सरकार के सत्ता संभालने के शुरुआती दौर तक विखंडनकारी रूप से जारी रही, जिसने देश की कानून-व्यवस्था के लॉजिस्टिक्स पर गंभीर विधिक सवाल खड़े कर दिए हैं।
मानवाधिकार संगठन ने सार्वजनिक दस्तावेजों, मीडिया रिपोर्टों और ऑन-ग्राउंड साक्ष्यों का कड़ा विश्लेषण करने के बाद बताया कि इन विखंडनकारी घटनाओं के शिकार होने वालों में केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि सामुदायिक नेता, छात्र, श्रमिक और आम नागरिक भी कड़ाई से शामिल थे। मृतकों में प्रमुख रूप से अवामी लीग के समर्थक, गोपालगंज के युवा कार्यकर्ता इलाही सिकदार, रंगपुर की गारमेंट श्रमिक चंपा खातून और पूर्व सरकारी मंत्री रमेश चंद्र सेन जैसे हाई-प्रोफाइल नाम विलेख रूप से दर्ज हैं। रिपोर्ट में कूटनीतिक तर्क दिया गया है कि ये मौतें महज प्रशासनिक लापरवाही या अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह बांग्लादेश की न्याय प्रणाली के भीतर व्याप्त एक गहरी संस्थागत और प्रणालीगत त्रुटि को विधिक रूप से दर्शाती हैं।
जीसीडीजी ने मनमानी गिरफ्तारियों, यातनाओं, निष्पक्ष सुनवाई के अभाव और जवाबदेही की कड़क कमी को लेकर अपनी रिपोर्ट में गहरी अंतरराष्ट्रीय चिंता व्यक्त की है। रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को दी जा रही कूटनीतिक धमकियों के कारण जमीनी स्तर पर वास्तविक मौतों का आंकड़ा इस विलेख संख्या से कहीं अधिक होने की आशंका है। संस्था ने संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से बांग्लादेश में कानून के शासन को बहाल करने तथा इन संदेहास्पद मौतों की एक स्वतंत्र, पारदर्शी और निष्पक्ष न्यायिक जांच सुनिश्चित कराने की कड़ी मांग की है ताकि भविष्य के उल्लंघनों को कड़ाई से रोका जा सके।