इनकम टैक्स विभाग ने टैक्स चोरी रोकने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए आकलन वर्ष (AY) 2026-27 के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फॉर्म में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (CBDT) के नए नोटिफिकेशन के अनुसार, अब ITR-4 फाइल करने वाले करदाताओं को अपने बैंक खातों में मौजूद बैलेंस की जानकारी भी साझा करनी होगी।
क्या है नया नियम?
पहले करदाताओं को केवल अपने बैंक खातों का विवरण (बैंक का नाम, खाता संख्या और IFSC कोड) देना होता था। लेकिन 30 मार्च 2026 को जारी नए नियमों के तहत, अब करदाताओं को वित्तीय वर्ष के अंत (31 मार्च) तक अपने सभी बैंक खातों में मौजूद क्लोजिंग बैलेंस (Closing Balance) का खुलासा करना होगा।
किन टैक्सपेयर्स को होगी परेशानी?
यह नियम मुख्य रूप से उन लोगों को प्रभावित करेगा जो प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन स्कीम (Presumptive Taxation Scheme) का लाभ उठाते हैं। इसमें निम्नलिखित वर्ग शामिल हैं:
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छोटे व्यवसायी: जिनका सालाना टर्नओवर एक निश्चित सीमा (धारा 44AD) के भीतर है।
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प्रोफेशनल्स: जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, फ्रीलांसर और कंसल्टेंट (धारा 44ADA)।
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ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स: जो माल ढुलाई के व्यवसाय में हैं (धारा 44AE)।
सरकार का उद्देश्य: डेटा आधारित निगरानी
इस बदलाव के पीछे सरकार का मुख्य उद्देश्य टैक्सपेयर की जीवनशैली और घोषित आय के बीच के अंतर को समझना है।
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पारदर्शिता: बैंक बैलेंस की जानकारी से टैक्स विभाग यह मिलान कर सकेगा कि घोषित आय और खातों में जमा राशि में कोई बड़ी विसंगति तो नहीं है।
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डेटा मिलान: अब 'एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट' (AIS) और बैंक बैलेंस के डेटा को ट्रैक करना विभाग के लिए और भी आसान हो जाएगा।
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टैक्स चोरी पर लगाम: बेहिसाब संपत्ति या आय को छिपाना अब और भी मुश्किल होगा।
टैक्सपेयर्स के लिए सलाह
विशेषज्ञों का कहना है कि अब टैक्सपेयर्स को अपनी बैंकिंग ट्रांजैक्शन और बैलेंस का सटीक रिकॉर्ड रखना होगा। यदि बैंक बैलेंस आपकी घोषित आय से मेल नहीं खाता है, तो टैक्स विभाग से नोटिस मिलने की संभावना बढ़ सकती है। इसलिए, रिटर्न फाइल करते समय बैंक स्टेटमेंट से डेटा का मिलान करना बेहद जरूरी है।