भारतीय पर्यटकों की छुट्टियों की आदतों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अब लोग पहले से बनी सख्त योजनाओं (Fixed Itinerary) और हर जगह का चक्कर लगाने के बजाय 'एंटी-इटिनररी' (Anti-itinerary) ट्रैवल को अपना रहे हैं। इस नए ट्रेंड के तहत यात्री बिना किसी तय शेड्यूल के छुट्टियां बिताने निकलते हैं, जहां उनका मुख्य उद्देश्य आराम करना, स्थानीय संस्कृति को महसूस करना और मनमुताबिक जगहों पर रुकना होता है।
क्या है एंटी-इटिनररी ट्रैवल?
एंटी-इटिनररी ट्रैवल का मतलब है बिना किसी पूर्व-नियोजित सूची या समय-सारणी के यात्रा करना। इसमें यात्री महीनों पहले से होटल या फ्लाइट बुक करने के बजाय ऐन मौके (Last-minute) पर योजना बनाते हैं।
- लचीलापन (Flexibility): यदि यात्रियों को कोई शहर या समुद्र तट ज्यादा पसंद आ जाता है, तो वे वहां अपनी रुकने की अवधि बढ़ा देते हैं और अन्य प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों को छोड़ देते हैं।
- मौसम और स्थानीय सुझाव: यात्रा के दौरान मौसम के मिजाज, स्थानीय लोगों की सिफारिशों या साथी यात्रियों से मिलने वाली जानकारी के आधार पर अगले कदम तय किए जाते हैं।
ट्रेंड के पीछे की मुख्य वजहें
ट्रैवल विशेषज्ञों और रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बदलाव के पीछे कई अहम कारण हैं:
- 'कुछ न करने' की चाहत: एयरबीएनबी और यूगोव (Airbnb & YouGov) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 66% यात्री यात्रा से कुछ दिन या हफ्ते भर पहले ही बुकिंग करते हैं। वहीं, दो-तिहाई लोग केवल आराम करने (Do nothing) के लिए यात्रा पर निकलते हैं।
- सुविधाजनक नीतियां: रिमोट वर्क (Work from home/anywhere), आसान वीजा ऑन अराइवल (Visa on arrival) विकल्प और होटलों की रिफंडेबल व फ्लेक्सिबल कैंसिलेशन पॉलिसियों ने लोगों के लिए अचानक प्लान बनाना आसान कर दिया है।
- अनुभव को प्राथमिकता: पुणे स्थित K2 Journeys के सीईओ गजानन जोशी के मुताबिक, अब लोग केवल 'बकेट लिस्ट' पूरी करने या टूरिस्ट स्पॉट्स पर सही का निशान लगाने के लिए यात्रा नहीं करते। जो लोग कई बार यात्रा कर चुके हैं, वे एक ही जगह जाकर धीमी गति से वक्त बिताना पसंद करते हैं।
विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों की राय
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह ट्रेंड दैनिक जीवन के तनाव, समय सीमा (Deadlines) और सख्त रूटीन से मुक्ति पाने की इच्छा को दर्शाता है। बिना किसी योजना के यात्रा करने से दिमाग को ज्यादा सुकून मिलता है।
हालांकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी भी दी है कि पूरी तरह योजना न बनाने से अंतिम समय पर महंगे टिकट, होटल न मिलने या बजट बिगड़ने जैसी लॉजिस्टिक समस्याएं भी आ सकती हैं। इसलिए बुनियादी व्यवस्थाओं (जैसे वीजा और रिफंडेबल बुकिंग) के साथ थोड़ा लचीलापन बनाए रखना सबसे बेहतर तरीका माना जाता है।