बच्चों में लगातार आंखें मलने (Eye Rubbing) की सामान्य-सी दिखने वाली आदत उनकी आंखों की रोशनी के लिए बेहद नुकसानदायक साबित हो सकती है। हाल ही में डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि एलर्जी या जलन के कारण बार-बार आंखें रगड़ने से कॉर्निया (आंख का पारदर्शी हिस्सा) की संरचना बिगड़ सकती है, जिससे 'केराटोकोनस' (Keratoconus) नाम की गंभीर बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है।
12 साल की बच्ची का मामला आया सामने
विटियोरेटना एवं यूविया विशेषज्ञ डॉ. आशीष मार्कन ने एक 12 वर्षीय बच्ची का मामला साझा किया, जिसे दृष्टि धुंधली होने और चश्मे का नंबर लगातार बदलने की शिकायत पर लाया गया था। जांच और 'कॉर्नियल टोपोग्राफी' टेस्ट के दौरान पता चला कि बच्ची में गंभीर एस्टिग्मैटिज्म और केराटोकोनस विकसित हो चुका है।
डॉक्टर के अनुसार, बच्ची को लंबे समय से एलर्जी थी और वह बार-बार अपनी आंखें मलती थी। लगातार दबाव (mechanical stress) पड़ने से उसकी आंख का कॉर्निया कमजोर होकर बाहर की ओर उभर गया और शंकु (cone) के आकार का हो गया।
केराटोकोनस (Keratoconus) क्या है?
जब आंखों को बार-बार या जोर से मला जाता है, तो कॉर्निया की ऊतक संरचनाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इसके कारण:
- कॉर्निया पतला होकर बाहर की तरफ उभर जाता है।
- रोशनी धुंधली (Blurry vision) हो जाती है।
- चश्मे के नंबर में तेजी से बदलाव आता है और सिर्फ चश्मे से रोशनी ठीक नहीं हो पाती।
- यदि सही समय पर इलाज न मिले, तो आंखों में स्थायी दाग बन सकते हैं और अंततः कॉर्निया ट्रांसप्लांट (Corneal Transplant) की जरूरत पड़ सकती है।
किन बच्चों में ज्यादा जोखिम है?
किम्स हॉस्पिटल्स, ठाणे के नेत्र विशेषज्ञ डॉ. चैतन्य वेमू के अनुसार:
- बढ़ते बच्चे और किशोर: बच्चों के आंखों के कॉर्निया का विकास हो रहा होता है, जिससे वे अधिक संवेदनशील होते हैं।
- एलर्जी से पीड़ित बच्चे: जिन्हें लगातार आंखों में खुजली या जलन की समस्या रहती है।
- आनुवंशिक कारण: कुछ मामलों में यह बीमारी पारिवारिक इतिहास के कारण भी हो सकती है।
बचाव और इलाज के उपाय
- सख्त रोकथाम: बच्चों को बिना वजह या खुजली होने पर बार-बार आंखें मलने से रोकें।
- एलर्जी का इलाज: आंखों में खुजली या एलर्जी होने पर डॉक्टर की सलाह से आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल करें।
- शुरुआती जांच: यदि बच्चा धुंधला दिखने या चश्मे का पावर तेजी से बदलने की शिकायत करे, तो तुरंत कॉर्नियल टोपोग्राफी टेस्ट कराएं।
- उपचार के विकल्प: शुरुआती चरणों में विशेष कॉन्टैक्ट लेंस या 'कॉर्नियल क्रॉस-लिंकिंग' (Corneal Cross-linking) प्रक्रिया से कॉर्निया को मजबूत किया जा सकता है ताकि बीमारी को आगे बढ़ने से रोका जा सके।