रूस-यूक्रेन युद्ध और दुनिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई देश अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने की तैयारी में जुट गए हैं। इन देशों का लक्ष्य युद्ध जैसी परिस्थितियों में दूसरे देशों पर निर्भरता कम करना और अपने यहां पर्याप्त मात्रा में गोला-बारूद, विस्फोटक और सैन्य सामग्री तैयार करना है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, NATO देशों में इस समय कम से कम 24 नए रक्षा उत्पादन प्रोजेक्ट चल रहे हैं। इनमें गोला-बारूद के लिए जरूरी प्रोपेलेंट (Propellant) और विस्फोटक बनाने वाली फैक्ट्रियों का निर्माण शामिल है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान बड़ी मात्रा में हथियारों की खपत ने पश्चिमी देशों को अपनी उत्पादन क्षमता की कमी का एहसास कराया है।
दशकों बाद अमेरिका में बनेंगी नई प्रोपेलेंट फैक्ट्रियां
अमेरिका में लंबे समय से नई प्रोपेलेंट उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ाई गई थी। वर्तमान में देश में एक प्रमुख प्रोपेलेंट फैक्ट्री है, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के समय वर्जीनिया में स्थापित किया गया था। 1970 के दशक के बाद अमेरिका में इस क्षेत्र में कोई बड़ी नई फैक्ट्री नहीं बनी।
अब अमेरिका के आर्कान्सस (Arkansas) राज्य में तीन नई प्रोपेलेंट फैक्ट्रियां स्थापित की जा रही हैं। इनमें:
- Regulus Global
- D&M Holding
- Hanwha Defense (South Korea)
जैसी कंपनियां शामिल हैं।
Regulus Global कई दशकों बाद अमेरिका में ट्रिपल-बेस प्रोपेलेंट का उत्पादन शुरू करने वाली कंपनियों में शामिल होगी। यह प्रोपेलेंट आधुनिक तोपों और सैन्य गोला-बारूद के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत भी बढ़ा रहा है रक्षा उत्पादन
वैश्विक स्तर पर रक्षा उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में भारत भी अपनी क्षमता मजबूत कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की Kalyani Strategic Systems जैसी कंपनियां गोला-बारूद उत्पादन बढ़ाने की योजना पर काम कर रही हैं।
भारत पिछले कुछ वर्षों में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दे रहा है और घरेलू कंपनियों के माध्यम से हथियार तथा सैन्य उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
यूरोप में नई TNT फैक्ट्रियों की तैयारी
यूरोपीय देश भी अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने में तेजी ला रहे हैं। यूरोप में कम से कम तीन नई TNT (Trinitrotoluene) फैक्ट्रियां बनाने की योजना है। TNT सैन्य विस्फोटकों में इस्तेमाल होने वाला एक प्रमुख रासायनिक पदार्थ है।
अमेरिका में भी कई दशकों बाद TNT उत्पादन दोबारा शुरू करने की तैयारी की जा रही है। वहीं ब्रिटेन ने वर्ष 2030 तक कम से कम छह नई विस्फोटक फैक्ट्रियां बनाने का लक्ष्य रखा है।
कोल्ड वॉर के बाद बदली थी रणनीति
विशेषज्ञों के अनुसार, शीत युद्ध (Cold War) खत्म होने के बाद अमेरिका और यूरोप ने रक्षा खर्च में कटौती कर दी थी। इसके कारण कई हथियार और गोला-बारूद बनाने वाली फैक्ट्रियां बंद हो गईं और उत्पादन क्षमता का बड़ा हिस्सा एशिया सहित दूसरे क्षेत्रों में चला गया।
लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के लिए बड़े पैमाने पर हथियार उत्पादन की जरूरत होती है। इसी वजह से पश्चिमी देश अब अपनी घरेलू रक्षा आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर ध्यान दे रहे हैं।
बढ़ते रक्षा खर्च का वैश्विक असर
अमेरिका और यूरोप की यह रणनीति वैश्विक रक्षा उद्योग में बड़ा बदलाव ला सकती है। आने वाले वर्षों में हथियार, विस्फोटक और सैन्य उपकरणों के उत्पादन में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। हालांकि, इससे वैश्विक हथियार प्रतिस्पर्धा और रक्षा खर्च में वृद्धि को लेकर नई बहस भी शुरू हो सकती है।