एक्टर-प्रोड्यूसर कुणाल कपूर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर फिल्म इंडस्ट्री में एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपने विचार शेयर करते हुए कहा कि AI को लेकर आज जो आशंका दिखाई दे रही है, वह पहले भी तकनीकी बदलावों के समय देखने को मिल चुकी है।
कपूर ने अपने पोस्ट में डिजिटल कैमरों और डिजिटल एडिटिंग के शुरुआती दौर का उदाहरण देते हुए लिखा कि जब ये तकनीकें आई थीं, तब भी फिल्ममेकर्स को लगा था कि सिनेमा की आत्मा और उसका “जादू” खत्म हो जाएगा। उन्होंने लिखा, “बहुत से फ़िल्ममेकर्स कहते हैं कि वे AI को कभी नहीं छुएंगे। जब डिजिटल कैमरे आए, तो फ़िल्ममेकर्स ने कहा कि हम सिनेमा का जादू खो देंगे। जब डिजिटल एडिटिंग आई, तो एडिटर्स ने कहा कि हम फ़िल्म काटने की कला खो देंगे। वे सही थे। कुछ तो खोया था। और फिर भी, पहले से कहीं ज़्यादा लोगों ने और ज़्यादा फ़िल्में बनाईं। आज, शायद ही कोई पुराने तरीके पर वापस जाना चाहेगा। पुरानी यादों (नॉस्टैल्जिया) के मुकाबले काम करने की क्षमता (एफ़िशिएंसी) अक्सर जीतती है।”
उनके इस बयान ने फिल्म जगत में चल रही उस बहस को फिर से हवा दे दी है जिसमें एक तरफ परंपरागत फिल्ममेकिंग के समर्थक हैं और दूसरी तरफ नई तकनीक को अपनाने वाले लोग। कई अनुभवी फिल्मकार आज भी फिल्म स्टॉक और पारंपरिक तकनीकों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि डिजिटल टूल्स ने प्रोडक्शन को तेज, सस्ता और अधिक सुलभ बना दिया है।
AI को लेकर कुणाल कपूर का रुख खास इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वे खुद एंटरटेनमेंट टेक्नोलॉजी में निवेश से जुड़े रहे हैं। उनका मानना है कि AI भी उसी बदलाव की अगली कड़ी है, जिससे फिल्म इंडस्ट्री को गुजरना ही होगा। उनके अनुसार, यह तकनीक शुरुआत में असहज लग सकती है, लेकिन समय के साथ यह सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बन सकती है।
जैसे-जैसे AI राइटिंग, एडिटिंग और विजुअल इफेक्ट्स में अपनी जगह मजबूत कर रहा है, कुणाल कपूर का यह बयान एक बड़ा सवाल छोड़ता है—क्या तकनीकी प्रगति और रचनात्मकता एक साथ आगे बढ़ सकते हैं, या हर नए बदलाव के साथ कला का कोई हिस्सा पीछे छूट जाता है?