नई दिल्ली। भारत के चिकित्सा उपकरण क्षेत्र को वैश्विक बाजार में मजबूत पहचान दिलाने के लिए घरेलू विनिर्माण क्षमता, तकनीकी नवाचार और गुणवत्ता मानकों को लगातार बेहतर करने की जरूरत है। औषधि विभाग के सचिव मनोज जोशी ने शुक्रवार को कहा कि देश को केवल आयात पर निर्भरता कम करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ऐसे चिकित्सा उपकरण तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी मांग हो।
नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित दो दिवसीय ‘इंडिया मेडिकल डिवाइस 2026’ सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में जोशी ने कहा कि भारत में मेडिकल डिवाइस के स्थानीय उत्पादन में पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। कंज्यूमेबल्स, डिस्पोजेबल्स, डायग्नोस्टिक और इमेजिंग उपकरणों की असेंबली में देश ने अपनी क्षमता बढ़ाई है। अब अगला लक्ष्य उपकरणों के साथ-साथ उनके महत्वपूर्ण कलपुर्जों का घरेलू स्तर पर निर्माण करना होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि चिकित्सा उपकरणों का भारतीय बाजार करीब 16 अरब डॉलर का है, जबकि वैश्विक बाजार 600 अरब डॉलर से अधिक का है। ऐसे में भारतीय कंपनियों के सामने विस्तार की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं। इसके लिए देश को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ने, सीमा पार व्यापार को आसान बनाने और घरेलू मूल्य संवर्धन बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।
जोशी ने स्टार्टअप और बड़ी कंपनियों के बीच सहयोग को भी महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना है कि अनुसंधान एवं विकास से जुड़ी नई तकनीकों को बाजार तक पहुंचाने के लिए उद्योग और नवाचार आधारित संस्थानों के बीच मजबूत साझेदारी जरूरी है। सम्मेलन में भारत के औषधि महानियंत्रक राजीव सिंह रघुवंशी ने कहा कि मेडिकल डिवाइस क्षेत्र धीरे-धीरे आयात आधारित व्यवस्था से स्वदेशी उत्पादन की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने उच्च श्रेणी के चिकित्सा उपकरणों और इन-विट्रो डायग्नोस्टिक्स के क्षेत्र में घरेलू क्षमता मजबूत करने पर जोर दिया।
फिक्की के प्रतिनिधियों ने भी बताया कि भारत में आरएंडडी, इंजीनियरिंग, क्लिनिकल रिसर्च और विनिर्माण में निवेश बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह क्षेत्र रोजगार के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।