डायरेक्टर: नितिन कक्कड़
राइटर: बिलाल सिद्दीकी, विशेष भट्ट
कास्ट: इमरान हाशमी, दिशा पाटनी, शबाना आज़मी, पूरन गब्बी
ड्यूरेशन: 140 मिनट
19 साल किसी किरदार को पर्दे से दूर रखने के लिए बहुत लंबा वक्त होता है। खासकर तब, जब वह किरदार किसी अभिनेता के करियर के सबसेयादगार हिस्सों में शामिल हो। ‘आवारापन 2’ की सबसे बड़ी कामयाबी यही है कि यह शिवम पंडित को सिर्फ पुरानी यादों के सहारे वापस नहीं लाती।फिल्म यह सवाल पूछती है कि इतने सालों बाद वह आदमी कहां खड़ा है, जिसने कभी प्यार खोया, अपराध की दुनिया छोड़ी और अपनी जिंदगी को किसी तरह आगे बढ़ाने की कोशिश की। इमरान हाशमी के लिए शिवम अब सिर्फ एक किरदार नहीं, बल्कि एक ऐसा अतीत है जिसे वह इस बार औरज् यादा गहराई और खामोशी के साथ निभाते हैं।
कहानी की शुरुआत शिवम की जिंदगी के उसी खालीपन से होती है, जिसे वह अब तक अपने साथ लेकर चल रहा है। आलिया की याद उसकी जिंदगी से गई नहीं है और इसी दौरान उसकी मुलाकात एक छोटी बच्ची से होती है। वह उसे अपने संरक्षण में लेता है और उसका नाम आलिया रख देता है। यहां फिल्म थोड़ी देर के लिए एक बेहद निजी और इमोशनल रास्ता पकड़ती है। शिवम बच्ची में खोई हुई मोहब्बत को ढूंढने की कोशिश नहींकर रहा, बल्कि शायद उस गिल्ट को कम करना चाहता है कि वह कभी किसी को बचा नहीं पाया। लेकिन जब बच्ची ऐसे लोगों के हाथों में पहुंचजाती है जो बच्चों की तस्करी के धंधे में शामिल हैं, तो शिवम को फिर उसी दुनिया में उतरना पड़ता है जिससे वह बहुत पहले बाहर निकल चुका था।
यहीं से फिल्म अपना दायरा बड़ा कर लेती है। पहली ‘आवारापन’ का दर्द काफी व्यक्तिगत था, जबकि इसका सीक्वल संगठित अपराध, मानवतस्करी, ड्रग्स और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तक पहुंचता है। अच्छी बात यह है कि शिवम को जबरदस्ती एक्शन हीरो बनाने की कोशिश नहीं की गई। वहखुद लड़ाई नहीं चाहता। परिस्थितियां उसे वहां ले जाती हैं। उसके पास अपराध की दुनिया का अनुभव है, लेकिन उसे यह भी पता है कि उस दुनिया मेंवापस जाने की कीमत क्या होती है। यही संघर्ष फिल्म को इमोशनल बेस देता है, और एक्शन, सिर्फ दिखाने के लिए बल्कि जरूरत बन जाता है.
इमरान हाशमी फिल्म के सबसे मजबूत कड़ी हैं। शिवम की वापसी में वह पुराना गुस्सा कम और जिंदगी से आई थकान ज्यादा दिखाई देती है। उनकीआंखों और खामोशी में काफी कुछ चलता रहता है, और कई जगह वह बिना ज्यादा संवाद के भी सीन संभाल लेते हैं। जब शिवम हिंसा पर उतरता हैतो वह किसी नए एक्शन स्टार का परिचय नहीं लगता, बल्कि उस पुराने आदमी की वापसी महसूस होती है जिसे उसने सालों से दबाकर रखा था। यहीवजह है कि किरदार की उम्र और उसके अनुभव फिल्म में सिर्फ मेकअप या लुक के जरिए नहीं, बल्कि इमरान की बॉडी लैंग्वेज में नजर आते हैं।
दिशा पाटनी का ज़ारा वाला किरदार कहानी में एक अलग तरह की संवेदनशीलता लेकर आता है। वह अपराध की दुनिया का हिस्सा होते हुए भी उससेपूरी तरह जुड़ी हुई नहीं है। उसके भाई ज़ोरावर की भूमिका में पूरन गब्बी खास तौर पर ध्यान खींचते हैं। उनका किरदार जितना खतरनाक है, उतना हीअप्रत्याशित भी, और अभिनेता उसे किसी सामान्य फिल्मी विलेन की तरह नहीं निभाते। शबाना आज़मी भी नफ़ीसा के रूप में फिल्म को वजन देती हैं।उनके किरदार में एक ठंडापन है, जो कहानी के अपराध वाले हिस्से को और गंभीर बनाता है।
और फिर आता है संगीत, जो इस फ्रेंचाइज़ी की पहचान का हिस्सा रहा है। ‘आवारापन 2’ इस मामले में अपनी जड़ों को भूलती नहीं है। मिथुन, अमाल मलिक और जीत गांगुली का संगीत कहानी के साथ चलता है और पुराने गानों की याद को सिर्फ नॉस्टैल्जिया के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया। नए और पुराने सुरों के बीच फिल्म अपने किरदारों की तड़प, अकेलेपन और मोहब्बत को जगह देती है। अरिजीत सिंह की आवाज़ में ‘ये आवारापन’ खासतौर पर शिवम की भावनात्मक यात्रा के साथ अच्छी तरह बैठता है। बड़े पर्दे और थिएटर के साउंड में इन गानों का असर और बढ़ जाता है।
नितिन कक्कड़ का निर्देशन फिल्म को लगातार बड़े कैनवास पर रखने की कोशिश करता है। एक्शन, लोकेशन और क्राइम नेटवर्क का स्केल पहलीफिल्म से काफी अलग है। हालांकि इसी वजह से कभी-कभी वह कच्चापन और निजी एहसास थोड़ा पीछे छूट जाता है, जो 2007 वाली ‘आवारापन’ की सबसे बड़ी ताकत था। कुछ हिस्सों में कहानी को थोड़ा और कसने की गुंजाइश महसूस होती है, खासकर तब जब फिल्म अपने इमोशनल हिस्से सेनिकलकर बड़े क्राइम थ्रिलर मोड में चली जाती है। लेकिन फिल्म की रफ्तार और मुख्य किरदार की भावनात्मक वजह इसे संभाल लेती है।
सबसे अहम बात यह है कि ‘आवारापन 2’ पहली फिल्म की नकल बनने की कोशिश नहीं करती। यह शिवम पंडित को उसी जगह खड़ा नहीं करती जहां हमने उसे 2007 में छोड़ा था। वह बदल चुका है, उसकी प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं और उसके घाव भी पुराने हो चुके हैं। फिल्म कभी-कभीअपने बड़े स्केल में ओरिजिनल की सादगी खो देती है, लेकिन शिवम की कहानी का भावनात्मक केंद्र बरकरार रहता है। इमरान हाशमी पूरी पकड़ केसाथ किरदार में लौटते हैं और यही वापसी फिल्म को उसका सबसे बड़ा कारण देती है। अगर पहली ‘आवारापन’ एक टूटे हुए आदमी की प्रेम कहानीथी, तो दूसरी फिल्म उसी आदमी की प्रायश्चित और जिम्मेदारी की कहानी है। पुराने शिवम को देखने की उम्मीद लेकर जाएंगे तो कुछ चीजें अलग मिलेंगी, लेकिन एक नए अध्याय के तौर पर देखें तो ‘आवारापन 2’ एक असरदार और बड़े पर्दे पर देखने लायक क्राइम ड्रामा बनकर सामने आती है।