भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और आयातित प्राकृतिक गैस, खाद तथा रसायनों पर निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार कोयले से सिंथेटिक गैस और केमिकल बनाने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है। सरकार ने इस दिशा में करीब 37,500 करोड़ रुपये की इंसेंटिव स्कीम भी तैयार की है। हालांकि, इस योजना को जमीन पर उतारने में एक बड़ी चुनौती सामने आ गई है।
देश की प्रमुख ऊर्जा और औद्योगिक कंपनियों का कहना है कि केवल वित्तीय सहायता या वायबिलिटी गैप फंडिंग यानी VGF से इतने बड़े प्रोजेक्ट्स में निवेश आकर्षित करना मुश्किल होगा। उद्योग जगत चाहता है कि सरकार सिंथेटिक गैस और उससे बनने वाले रसायनों की Assured Offtake Guarantee यानी खरीद की पक्की गारंटी दे। कंपनियों का मानना है कि सरकार की ओर से लंबे समय तक उत्पाद खरीदने की स्पष्ट व्यवस्था होने पर ही बड़े पैमाने पर निजी निवेश संभव होगा।
10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश जोखिम
कोल गैसीफिकेशन प्लांट सामान्य औद्योगिक परियोजनाओं की तुलना में बेहद पूंजी-गहन होते हैं। एक बड़े प्रोजेक्ट की लागत 10,000 करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकती है। ऐसे में कंपनियों के सामने सिर्फ प्लांट बनाने का खर्च नहीं, बल्कि तैयार उत्पाद की बिक्री और बाजार से जुड़े जोखिम भी होते हैं।
अगर कोई कंपनी हजारों करोड़ रुपये का निवेश करती है और प्लांट से बनने वाली सिंथेटिक गैस, मेथनॉल या अन्य रसायनों को बेचने के लिए पहले से बाजार सुनिश्चित नहीं है, तो प्रोजेक्ट की आर्थिक व्यवहार्यता कमजोर पड़ सकती है। यही वजह है कि उद्योग जगत अब सरकार से वित्तीय मदद के साथ-साथ बाजार की गारंटी भी मांग रहा है।
क्यों जरूरी है Assured Offtake Guarantee?
कंपनियों के मुताबिक सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि गैसीफिकेशन प्लांट से बनने वाले उत्पाद को कौन खरीदेगा, कितनी मात्रा में खरीदेगा और किस तरह की कीमत व्यवस्था होगी। लंबे समय के खरीद समझौते से कंपनियों को भविष्य की आमदनी का अनुमान लगाने में मदद मिलेगी।
ऐसी गारंटी से बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए भी परियोजनाओं को फंड करना आसान हो सकता है। इससे कंपनियों के निवेश का जोखिम घटेगा और बड़े प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
माइन-हेड जमीन और फ्रेट सपोर्ट की भी मांग
इंडस्ट्री की मांग सिर्फ खरीद की गारंटी तक सीमित नहीं है। कंपनियां कोयला खदानों के नजदीक जमीन उपलब्ध कराने और लॉजिस्टिक्स लागत कम करने के लिए फ्रेट सपोर्ट की भी मांग कर रही हैं।
कोयले को दूर स्थित प्लांट तक पहुंचाने में परिवहन लागत काफी बढ़ सकती है। इसलिए माइन-हेड के पास गैसीफिकेशन प्लांट स्थापित करने से लॉजिस्टिक खर्च कम किया जा सकता है।