देश की न्याय व्यवस्था पर संकट: खाली पद और पेंडिंग मुकदमों का बढ़ता बोझ
भारतीय न्याय प्रणाली वर्तमान समय में दो बेहद गंभीर और समानांतर चुनौतियों का सामना कर रही है। एक ओर जहाँ देश के उच्च न्यायालयों (High Courts) में जजों की भारी कमी बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर अदालतों में लंबित (Pending) मामलों का ढेर लगातार बढ़ता जा रहा है। राज्यसभा में सरकार द्वारा पेश किए गए आधिकारिक आंकड़े इस चिंताजनक स्थिति की भयावह तस्वीर पेश करते हैं।
जजों के खाली पदों का भयावह आंकड़ा
संसद में कानून मंत्री द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, देश के 25 हाईकोर्ट्स में कुल स्वीकृत पदों और कार्यरत जजों के बीच बड़ा अंतर है:
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स्वीकृत पद: 1,122
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कार्यरत जज: 781
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रिक्त पद: 341
आंकड़ों का विश्लेषण करें तो साफ होता है कि देश के उच्च न्यायालयों में लगभग 30% पद खाली पड़े हैं। सरल शब्दों में कहें तो हाईकोर्ट्स में हर तीसरा जज का पद खाली है।
इन हाईकोर्ट्स में स्थिति सबसे चिंताजनक
रिक्त पदों के मामले में देश के कुछ प्रमुख हाईकोर्ट्स की स्थिति बेहद नाजुक है:
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इलाहाबाद हाईकोर्ट: यहाँ सबसे अधिक 52 पद खाली हैं और 12 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं।
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कलकत्ता हाईकोर्ट: 31 पद खाली।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट: 30 पद खाली।
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मद्रास हाईकोर्ट: 24 पद खाली।
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बॉम्बे हाईकोर्ट: 19 पद खाली।
केवल इन पाँच उच्च न्यायालयों में ही कुल 176 पद खाली हैं, जो देशभर की कुल रिक्तियों का आधे से अधिक हिस्सा है।
नियुक्ति प्रक्रिया और देरी की वजह
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद में स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट्स में न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 217 और 224 के तहत की जाती है। यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें संबंधित हाईकोर्ट, राज्य सरकार, केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम (Supreme Court Collegium) की संयुक्त भूमिका होती है।
नियुक्ति के नियमों यानी मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (MoP) के अनुसार, किसी भी पद के खाली होने से कम से कम 6 महीने पहले नए नामों की सिफारिश भेज दी जानी चाहिए। हालाँकि, व्यावहारिक रूप से प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक देरी के कारण ऐसा नहीं हो पाता, जिससे पद महीनों और सालों तक खाली पड़े रहते हैं।
आम जनता पर असर
जजों की स्वीकृत क्षमता से काफी कम संख्या में काम करने का सीधा प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ रहा है। अदालतों में मुकदमों की सुनवाई की रफ्तार धीमी हो रही है, जिससे 'समय पर इंसाफ' (Timely Justice) पाने का संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो रहा है। जब तक नियुक्ति प्रक्रिया को तेज और सुचारू नहीं बनाया जाता, तब तक लंबित मुकदमों के इस विशाल बोझ को कम करना एक बेहद कठिन चुनौती बना रहेगा।