उत्तर प्रदेश में जिलों और प्रशासनिक इकाइयों के नाम बदलने की सियासत एक बार फिर चरम पर पहुंच गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कालीन नगरी भदोही का नाम पुनः 'संत रविदास नगर' करने की हालिया घोषणा के बाद राज्य के पिछले तीन दशकों के राजनीतिक इतिहास की परतें उधड़ आई हैं। यूपी में सत्ता परिवर्तन के साथ जिलों के नामकरण की यह परिपाटी केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि बहुजन प्रतीकवाद, समाजवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के वैचारिक द्वंद्व की गवाह रही है।
नाम बदलने के इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा अध्याय 2007 से 2011 के दौरान बसपा सुप्रीमो मायावती के शासनकाल में लिखा गया था। तब बसपा सरकार ने सामाजिक न्याय की अवधारणा के तहत नौ जिलों का नामकरण बहुजन महापुरुषों के नाम पर किया था, जिसमें अमेठी को छत्रपति शाहूजी महाराज नगर, कासगंज को कांशीराम नगर और हाथरस को महामाया नगर बनाया गया था। हालांकि, 2012 में सत्ता में आई अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी सरकार ने प्रशासनिक दुविधा और स्थानीय पहचान का हवाला देते हुए इन सभी नौ जिलों के पुराने नाम बहाल कर दिए थे, जिसे बसपा ने महापुरुषों का अनादर बताया था।
वर्ष 2017 में भाजपा के सत्तासीन होने के बाद इस राजनीति ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण का रूप ले लिया। योगी सरकार ने पौराणिक महत्व को प्राथमिकता देते हुए 2018 में इलाहाबाद का नाम 'प्रयागराज' और फैजाबाद का नाम बदलकर 'अयोध्या' कर दिया। अब भदोही के नामकरण से भाजपा न केवल संत रविदास की विरासत को सम्मान देने का संदेश दे रही है, बल्कि दलित और पिछड़े वर्ग के बीच अपनी राजनीतिक पैठ को भी सुदृढ़ करने का प्रयास कर रही है।