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भारतीय कपड़ा उद्योग का स्वर्णिम काल: केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने छोटे कारीगरों और एमएसएमई को बताया देश की असली ताकत, निर्यात लक्ष्य 9 लाख करोड़ रुपये तय

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Posted On:Friday, July 17, 2026

नयी दिल्ली: भारत के फैशन और परिधान उद्योग को एक नई वैश्विक पहचान देने के रणनीतिक विन्यास के तहत केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने देश के कपड़ा क्षेत्र के भविष्य को लेकर एक बेहद उत्साहजनक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। प्रगति मैदान के भारत मंडपम में आयोजित वैश्विक टेक्सटाइल प्रदर्शनी 'भारत टेक्स-2026' के तीसरे दिन (गुरुवार, 16 जुलाई 2026) एक विशेष सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश के छोटे कारीगर, लक्ज़री डिज़ाइनर और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के सबसे विश्वसनीय ब्रांड स्थापित करने की अपार क्षमता रखते हैं। उन्होंने बल दिया कि हमारी समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण इन्हीं छोटे उद्यमियों के हाथों में सुरक्षित है।

इस महत्वाकांक्षी व्यापारिक लॉजिस्टिक्स और कपड़ा मंत्रालय की हालिया विज्ञप्ति के सांख्यिकी आंकड़ों पर गौर करें तो वित्त वर्ष 2025–26 में भारत का कपड़ा एवं परिधान निर्यात मूल्य लगभग 3.16 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया है। सरकार ने इस सांख्यिकी आंकड़े को वर्ष 2030 तक बढ़ाकर 9 लाख करोड़ रुपये करने का एक कड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न विकसित देशों के साथ किए जा रहे मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को एक मजबूत सुरक्षा कवच के रूप में मुस्तैद किया जा रहा है, जिससे भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजारों में बिना किसी विखंडनकारी करों के सीधी पहुंच मिल सकेगी।

विशेष सत्र के नियमों और विलेखों के अनुसार, वेलस्पन वर्ल्ड, पश्मीना डॉट कॉम और ट्राइडेंट जैसे अग्रणी उद्योग प्रतिनिधियों सहित 20 से अधिक प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने इस चर्चा में भाग लिया। सत्र में यह निष्कर्ष निकला कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में धाक जमाने के लिए केवल उत्पादन की मात्रा ही नहीं, बल्कि वस्त्रों की गुणवत्ता, पर्यावरण-अनुकूल विकास (सस्टेनेबिलिटी) और ट्रेसेबिलिटी (उत्पाद की स्रोत से उपभोक्ता तक पारदर्शी जानकारी) जैसे मापदंड पुराने विवादों को खत्म करने में गेम-चेंजर साबित होंगे। खेल अब पूरी तरह से भारतीय फैशन में हो रहे इस ऐतिहासिक तकनीकी बदलाव, ओम्नी-चैनल विपणन क्षमताओं और वैश्विक उपभोक्ताओं की बदलती अपेक्षाओं के सांख्यिकी संतुलन पर टिका है।


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