"जब खाली समय होगा, तब सुनेंगे" — चीफ जस्टिस
याचिकाकर्ता और वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ (Bench) के समक्ष इस मामले को तत्काल सूचीबद्ध (List) करने का आग्रह किया।
इस पर पीठ ने बेहद व्यावहारिक लेकिन सख्त टिप्पणी की:
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कोर्ट का रुख: चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने जल्द सुनवाई से इनकार करते हुए कहा, "जब हमारे पास फ्रीबीज पर चर्चा करने के लिए खाली समय होगा, तब हम इस पर विस्तार से सुनवाई करेंगे। फिलहाल हमारे पास बहुत काम (लंबित मामले) हैं। यह एक ऐसा मामला है जो थोड़ा इंतजार कर सकता है।"
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कमेटी पर सहमति का तर्क: जब याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इस मुद्दे पर एक विशेषज्ञ समिति (Expert Committee) का गठन होना है और दोनों पक्ष (याचिकाकर्ता और सरकार) इस पर सहमत हैं, केवल कोर्ट की मंजूरी की जरूरत है; तब भी कोर्ट ने तुरंत तारीख देने से मना कर दिया। इस मांग का वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी समर्थन किया था।
क्या है पूरा मामला और याचिकाकर्ता की मांग?
यह मामला साल 2022 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। 25 जनवरी 2022 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) एनवी रमना की अगुवाई वाली बेंच ने इस याचिका पर संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
याचिका में उठाए गए मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन: याचिका में दावा किया गया है कि लोक-लुभावन मुफ्त उपहारों (Irrational Freebies) की घोषणा करना मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करने जैसा है, जो निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांतों के खिलाफ है। सख्त कार्रवाई की मांग: ऐसे वादे करने वाले दलों के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए उनके चुनाव चिह्न फ्रीज करने या मान्यता समाप्त करने का अधिकार चुनाव आयोग को दिया जाए।
हालांकि, इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों और विश्लेषकों के बीच तीखी बहस रही है। कई दलों का मानना है कि जनकल्याणकारी योजनाएं (जैसे मुफ्त राशन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं) समाज के पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए जरूरी हैं और इन्हें 'मुफ्त की रेवड़ी' या 'फ्रीबीज' कहना गलत है। अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस संवेदनशील और देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले विषय पर अगली सुनवाई कब करता है।