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सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का 20वां दिन: गिरती सेहत के बीच क्या सरकार अपनाएगी इरोम शर्मिला वाला रास्ता?

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Posted On:Friday, July 17, 2026

दिल्ली हाई कोर्ट ने भी वांगचुक की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि "हर नागरिक का जीवन अनमोल है" और केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि डॉक्टरों की एक टीम रोजाना उनके स्वास्थ्य की क्लीनिकल मॉनिटरिंग करे।

लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि सोनम वांगचुक बिना किसी सरकारी आश्वासन के अपनी हड़ताल खत्म करने को तैयार नहीं होते हैं, तो उनकी जान बचाने के लिए सरकार के पास क्या कानूनी और प्रशासनिक विकल्प बचते हैं? क्या सरकार मणिपुर की 'आयरन लेडी' इरोम शर्मिला जैसा रास्ता अपनाएगी?

सरकार के पास क्या हैं विकल्प?

यदि किसी आंदोलनकारी की भूख हड़ताल के कारण जान दांव पर लग जाए, तो प्रशासन और सरकार के पास मुख्य रूप से तीन रास्ते होते हैं:

1. चिकित्सा आधार पर हिरासत और 'नेज़ोगैस्ट्रिक ट्यूब' (जबरन नाक से भोजन देना)

यह वही तरीका है जो इरोम शर्मिला के मामले में अपनाया गया था।

  • कानूनी प्रावधान: भारतीय कानून के तहत किसी व्यक्ति को खुद को भूखा रखकर जान देने की अनुमति नहीं है। यदि डॉक्टर यह प्रमाणित करते हैं कि आंदोलनकारी के अंगों के फेल होने या मृत्यु का तात्कालिक खतरा है, तो पुलिस उन्हें 'आत्महत्या के प्रयास' या शांति भंग करने की कोशिश के आरोप में हिरासत में ले सकती है।

  • अस्पताल में भर्ती: हिरासत में लेने के बाद उन्हें सरकारी अस्पताल (जैसे AIIMS या राम मनोहर लोहिया अस्पताल) में भर्ती कराया जाएगा।

  • जबरन फीडिंग: अस्पताल के डॉक्टर कोर्ट या प्रशासन की अनुमति से नाक के रास्ते पेट में डाली जाने वाली ट्यूब (Nasogastric Tube) के जरिए लिक्विड डाइट और आवश्यक पोषक तत्व (Nutrients) देना शुरू कर देते हैं, जिससे व्यक्ति को जीवित रखा जा सके।

2. मध्यस्थता और राजनीतिक वार्ता (Negotiation)

सरकार किसी वरिष्ठ मंत्री या लद्दाख के प्रतिनिधियों के माध्यम से सोनम वांगचुक से सीधे बातचीत की मेज पर आ सकती है। सरकार की ओर से एक लिखित आश्वासन या उच्च स्तरीय समिति (High-Level Committee) के गठन का ठोस प्रस्ताव देकर उन्हें जूस पिलाकर अनशन तोड़ने के लिए मनाया जा सकता है।

3. नजरबंदी या न्यायिक हिरासत (Judicial Custody)

इरोम शर्मिला को आईपीसी की धारा 309 (जो अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) के नए स्वरूपों के तहत परिभाषित है) के तहत हिरासत में रखा गया था। चूंकि इस धारा के तहत अधिकतम सजा एक वर्ष की होती है, इसलिए शर्मिला को हर साल रिहा किया जाता था और दोबारा अनशन पर बैठने पर फिर से गिरफ्तार कर लिया जाता था। सरकार वांगचुक को भी कानून-व्यवस्था और उनके जीवन की सुरक्षा के मद्देनजर अस्थायी हिरासत में रख सकती है।

इरोम शर्मिला और 'मालोम नरसंहार' का इतिहास

सोनम वांगचुक के इस आंदोलन ने देश को एक बार फिर इरोम चानू शर्मिला के ऐतिहासिक संघर्ष की याद दिला दी है:

  • आंदोलन की वजह: 2 नवंबर 2000 को मणिपुर के मालोम में असम राइफल्स के जवानों द्वारा बस स्टैंड पर खड़े 10 बेगुनाह नागरिकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना (मालोम नरसंहार) के विरोध में और पूर्वोत्तर से AFSPA (आफस्पा - सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम) को हटाने की मांग को लेकर 28 वर्षीय शर्मिला 5 नवंबर 2000 को भूख हड़ताल पर बैठ गईं।

  • 16 साल का संघर्ष: इरोम शर्मिला का यह अनशन दुनिया का सबसे लंबा अनशन (16 वर्ष) बना। इस दौरान उन्हें पुलिस कस्टडी में रखा गया और नासा जेट (नाक की नली) के जरिए जबरन लिक्विड फूड देकर जिंदा रखा गया। उन्होंने अंततः अगस्त 2016 में अपना अनशन समाप्त किया था।

आगे क्या?

सोनम वांगचुक ने साफ कर दिया है कि वह पीछे हटने वाले नहीं हैं और उन्होंने समर्थकों से 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च में शामिल होने की अपील की है। अब गेंद पूरी तरह से केंद्र सरकार के पाले में है। देखना यह होगा कि क्या सरकार बातचीत के जरिए लद्दाख की मांगों पर कोई बीच का रास्ता निकालती है, या फिर वांगचुक की गिरती सेहत को देखते हुए उन्हें जबरन अस्पताल में भर्ती कराने का प्रशासनिक कदम उठाया जाता है।



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