भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक 3 अगस्त से शुरू हो चुकी है। केंद्रीय बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में आयोजित हो रही इस बैठक के फैसलों की घोषणा 5 अगस्त को की जाएगी। आगामी त्योहारों से ठीक पहले आयोजित हो रही इस समीक्षा बैठक पर देश के करोड़ों होम लोन, ऑटो लोन तथा अन्य ईएमआई (EMI) चुकाने वाले ग्राहकों की नजरें टिकी हुई हैं। बाजार विश्लेषकों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच रिजर्व बैंक इस बार भी नीतिगत रेपो दर (Repo Rate) को 5.25 प्रतिशत पर ही यथावत रख सकता है।
मौद्रिक समीक्षा के दौरान मुख्य ध्यान घरेलू मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने और आर्थिक वृद्धि दर को मजबूती प्रदान करने पर रहेगा। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, लाल सागर में आपूर्ति बाधाओं और कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण थोक व खुदरा मूल्य सूचकांक पर लगातार दबाव बना हुआ है। इसके अतिरिक्त अमेरिकी फेडरल रिजर्व के कड़े रुख और बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक फिलहाल 'इंतजार करो और देखो' (Wait and Watch) का रुख अपना सकता है, ताकि वित्तीय बाजार में तरलता (Liquidity) का संतुलन बना रहे।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि के सकारात्मक संकेतों और मानसूनी परिस्थितियों में सुधार के कारण तत्काल दरों में वृद्धि की संभावना बेहद कम है। हालांकि, यदि क्रूड ऑयल की दरें लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनी रहती हैं, तो चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में कड़े मौद्रिक कदमों पर विचार किया जा सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में रेपो रेट स्थिर रहने से खुदरा ग्राहकों को लोन ब्याज दरों में तात्कालिक राहत मिलेगी और बैंक ईएमआई पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की संभावना नहीं है।