अमेरिका और ईरान के मध्य बढ़ते सैन्य टकराव के कारण वैश्विक ऊर्जा लॉजिस्टिक्स प्रणाली में एक बड़ा विखंडनकारी संकट खड़ा हो गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही बाधित होने के बाद अब यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के प्रमुख समुद्री मार्ग बाबल-अल-मंदब पर सऊदी अरब के अरामको तेल टैंकरों की पूर्ण घेराबंदी का ऐलान किया है। इस रणनीतिक विन्यास और दोहरे नौसैनिक गतिरोध के सांख्यिकी विवरण के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें उछलकर 91.01 डॉलर प्रति बैरल से अधिक के स्तर पर पहुंच गई हैं।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के सांख्यिकी संतुलन के अनुसार, दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का लगभग 12 से 15 प्रतिशत हिस्सा और तेल आपूर्ति का 10 प्रतिशत इसी लाल सागर कॉरिडोर से गुजरता है। होर्मुज संकट के दौरान सऊदी अरब अपने 'यानबू' बंदरगाह के रास्ते लाल सागर से जो वैकल्पिक आपूर्ति कर रहा था, हूती नाकेबंदी के कारण उस पर भी ब्रेक लग गया है। मालवाहक जहाजों को अब पूरा अफ्रीका महाद्वीप घूमकर 'केप ऑफ गुड होप' के लंबे रास्ते का उपयोग करना पड़ रहा है, जिससे यात्रा समय में 14 से 30 दिनों की बढ़ोतरी और भारी समुद्री बीमा प्रीमियम (Insurance Premium) की लागत जुड़ रही है।
इस वैश्विक अस्थिरता का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है। रूस और मध्य पूर्व से भारत आने वाले कच्चे तेल के साथ-साथ यूरोप और अमेरिका को होने वाले बासमती चावल, चाय तथा इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात की परिवहन लागत में तीव्र वृद्धि होगी। यदि क्रूड का यह बढ़ा हुआ स्तर बना रहता है, तो आगामी महीनों में भारतीय तेल विपणन कंपनियों को घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दामों में 3 से 5 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी करने का कड़ा फैसला लेना पड़ सकता है।