क्या है 'Great Transshipment Scam'?
ट्रंप प्रशासन के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने 'The Great Transshipment Scam' नाम की रिपोर्ट में चीन पर आरोप लगाया है कि वह तीसरे देशों के जरिए अपने सामान को अमेरिकी बाजार तक पहुंचाकर टैरिफ से बचने की कोशिश कर रहा है।
नवारो के मुताबिक, 2018 में चीन पर अमेरिकी टैरिफ बढ़ाए जाने के बाद ट्रांसशिपमेंट का इस्तेमाल ज्यादा बढ़ा। इसमें चीन से सामान पहले किसी तीसरे देश में भेजा जाता है और फिर मामूली प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, री-लेबलिंग या इनवॉइस में बदलाव के बाद उसे दूसरे देश का उत्पाद बताकर अमेरिका भेजा जाता है।
भारत समेत किन देशों का नाम आया?
अमेरिकी रिपोर्ट में भारत के अलावा कनाडा, मैक्सिको, यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े व्यापारिक साझेदारों का नाम लिया गया है। इसके अलावा वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड और ब्राजील समेत कई अन्य देशों को भी ट्रांसशिपमेंट जोखिम वाले देशों के रूप में चिन्हित किया गया है।
हालांकि, किसी देश का रिपोर्ट में नाम आना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां की सरकार जानबूझकर चीन को अमेरिकी टैरिफ से बचाने में मदद कर रही है। अमेरिकी रिपोर्ट मुख्य रूप से उन देशों और व्यापारिक रास्तों को जोखिम के नजरिए से देखती है, जिनका इस्तेमाल चीनी सामान की उत्पत्ति छिपाने के लिए किया जा सकता है।
चीन कैसे करता है टैरिफ से बचने की कोशिश?
अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि चीन से आने वाले सामान को तीसरे देशों में भेजकर उसकी पहचान बदलने की कोशिश की जाती है। इसके लिए मामूली मैन्युफैक्चरिंग, री-पैकेजिंग, री-लेबलिंग, री-इनवॉइसिंग या शिपिंग रूट बदलने जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
ऐसे मामलों में अमेरिकी सीमा शुल्क अधिकारियों के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि किसी सामान का वास्तविक मूल देश कौन-सा है। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन नियमों के पालन और कस्टम्स जांच को ज्यादा सख्त करने की तैयारी कर रहा है।
AI से पकड़ी जाएगी टैरिफ चोरी
अमेरिका अब इस तरह की गतिविधियों की पहचान के लिए AI आधारित सिस्टम 'Detective Border' विकसित कर रहा है। यह सिस्टम शिपमेंट डेटा, सामान के रूट, उत्पाद की जानकारी, कंपनियों के आपसी संबंध और अन्य व्यापारिक आंकड़ों का विश्लेषण कर संदिग्ध शिपमेंट की पहचान करने में मदद करेगा।
इसका मकसद यह पता लगाना है कि कोई सामान वास्तव में तीसरे देश में बना है या सिर्फ चीन से अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए वहां से होकर भेजा गया है।
अमेरिका को कितना नुकसान होने का दावा?
व्हाइट हाउस की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रांसशिपमेंट के जरिए अमेरिकी टैरिफ से बचने वाले सामान का मूल्य अलग-अलग आकलन पद्धतियों के आधार पर काफी बड़ा हो सकता है। एक केंद्रीय अनुमान करीब 75 अरब डॉलर के सालाना सामान का है। AP के मुताबिक, प्रशासन का अनुमान है कि इस तरह की गतिविधियों के कारण अमेरिका को हर साल करीब 19 अरब से 26 अरब डॉलर तक के टैरिफ राजस्व का नुकसान हो सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला?
भारत का नाम अमेरिकी रिपोर्ट में आने से दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों पर इसका असर पड़ सकता है। अमेरिका और भारत पहले से ही टैरिफ और बाजार पहुंच जैसे मुद्दों पर बातचीत कर रहे हैं। ऐसे में अगर अमेरिकी अधिकारी भारतीय रास्तों से आने वाले चीनी सामान पर ज्यादा सख्ती करते हैं, तो भारतीय एक्सपोर्टर्स और कंपनियों के लिए नियमों का पालन और दस्तावेजी प्रक्रिया और महत्वपूर्ण हो सकती है।
कुल मिलाकर, ट्रंप प्रशासन का यह कदम केवल चीन पर टैरिफ लगाने तक सीमित नहीं है। अमेरिका अब उन तीसरे देशों और व्यापारिक नेटवर्क पर भी नजर बढ़ा रहा है, जिनके जरिए चीन अमेरिकी बाजार में ऊंचे टैरिफ से बचकर पहुंच बना सकता है। AI आधारित निगरानी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।